लोकप्रिय स्थान

चतरा के लोकप्रिय स्थान

चतरा जिला उत्तरी छोटानागपुर का प्रवेश द्वार है| पठारीय जगह होने के कारण यहाँ पर  प्राकृतिक पिकनिक स्थल बहुत सारे है| यहाँ पर  विविध प्रकार के  जंगली जीव और हरियाली देख सकता है।

इटखोरी भद्रकाली मंदिर

भद्रकाली मंदिर यह चतरा  के पूर्व में 35 किमी और जीटी  रोड  चौपारण से 16 किमी पश्चिम में है।पवित्र महाने  एवं बक्सा नदी के संगम पर अवस्थित इटखोरी मां भद्रकाली मंदिर परिसर तीन धर्मों का संगम स्थल है सनातन बौद्ध एवं जैन धर्म का यहाँ समागम हुआ है|प्रागैतिहासिक काल से इस पवित्र भूमि पर धर्म संगम की अलौकिक भक्ति धारा बहती चली आ रही है सनातन धर्मावलंबियों के लिए यह पावन भूमि मां भद्रकाली तथा सहस्त्र  शिवलिंग महादेव का सिद्ध पीठ के रूप में आस्था के केंद्र है वही बौधिष्ठो के लिए भगवान बुद्ध की तपोभूमि के रूपमें आराधना वा उपासना का स्थल है शांति की खोज में निकले युवराज सिद्धार्थ ने यहाँ  तपस्या की थी| उस वक्त उनकी मां उन्हें वापस ले जाने आयी थी | लेकिन जब सिद्धार्थ का ध्यान नहीं टूटा तो उनके मुख से इतखोई शब्द निकला जो बाद में इटखोरी में तब्दील हुआ| जैन धर्मावलंबियों ने जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ स्वामी की जन्मभूमि की मान्यता प्रदान की है|प्राचीन काल में तपस्वी मेघा मुनि ने अपने तप से इस परिसर को सिद्ध करके के सिद्धपीठ के रूप में स्थापित किया| भगवान राम के वनवास तथा पांडवों के अज्ञातवास की पौराणिक धार्मिक कथाओं में से मां भद्रकाली मंदिर परिसर का जुड़ाव रहा है| पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के द्वारा वर्ष 2011 में की गई खुदाई के दौरान के पुरातात्विक तथ्य सामने आए हैं पुरातत्व विभाग ने 9वी० 10वि० काल में मठ मंदिरों के निर्माण की पुष्टि की है इसके प्रमाण मंदिर के म्यूजियम में  पूर्व के प्राप्त अवशेषों के रूप में सहेज कर रखे हुए हैं| सेंड स्टोन पत्थर को तराश कर बनाए गए प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष तथा बहुमूल्य पत्थरों से निर्मित प्रतिमाएं और गौरवशाली अतीत की गाथा स्वयं सुनाती है| वर्तमान समय में मां भद्रकाली मंदिर प्रबंधन समिति की अगुवाई में मंदिर परिसर को अतीत  का  वैभव प्रदान करने का अनावरत   प्रयास किया जा रहा है|

मां भद्रकाली की प्रतिमा बेशकीमती काले पत्थर को तराश कर बनाई गई है|करीब 5 फीट ऊंची आदम कद प्रतिमा चतुर्भुज है प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में अंकित है की प्रतिमा का निर्माण 9 वी शताब्दी काल में राजा महेंद्र पाल द्वितीय ने कराया था| बौद्ध धर्म के लोग प्रतिमा को मां तारा के रूप में पूजते हैं|

कोल्हुआ पहाड़

समुद्र तल से 1750 फीट की ऊंचाई पर स्थित हंटरगंज प्रखंड से 6 किलोमीटर दूर ख्याति प्राप्त मां कौलेश्वरी मंदिर परिसर वैदिक काल से मान्यता प्राप्त तीर्थ स्थल है| यहां पहाड़ की चोटी पर तीनों धर्मों का समागम हुआ है | सनातन, बौद्ध एवं जैन धर्म का संगम स्थल माना जाता है| महाभारत काल में यह स्थल राजा विराट की राजधानी थी |धर्मपरायण राजा विराट ने ही मां कौलेश्वरी की प्रतिमा को यहां स्थापित किया था| तब से लेकर आज तक मां कौलेश्वरी जन-जन के आस्था का केंद्र बनी हुई हैं |महाकाव्य काल एवं पुराणकाल से भी इस पवित्र स्थल का रिश्ता जुड़ा हुआ है| सनातन धर्मावलंबी पूजा-अर्चना के साथ विवाह एवं बच्चों का मुंडन संस्कार यहां सदियों से करते आ रहे हैं बौद्ध धर्मावलंबी के लिए कौलेश्वरी पहाड़ भगवान बुद्ध की तपोभूमि के साथ मोक्ष प्राप्त करने का एक पवित्र स्थल है| यहां के मांडवा मांडवी नामक स्थल पर बौद्ध धर्मावलंबी बाल व नाखून का दान कर मोक्ष प्राप्त करने का संस्कार करते हैं |पहाड़ के कई पाषाणों ने बौद्ध भिक्षुओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है| जैन धर्म के दशवीं तीर्थंकर स्वामी शीतलनाथ की तपोभूमि कौलेश्वरी पहाड़ को माना जाता है धर्मावलंबियों ने पहाड़ की चोटी पर एक मंदिर का भी निर्माण किया है| जिसमें भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमाएं स्थापित है|इसके सबसे ऊँची चोंटी को आकाश लोचन कहा जाता है | यहाँ पर बहुत सारे प्राचीन मंदिर है जिसमे काफी प्रशिद्ध कौलेश्वरी मंदिर है |

कौलेश्वरी मंदिर

पहाड़ की चोटी पर बनी प्राचीन मंदिर में मां कौलेश्वरी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है | लोक व धार्मिक कथाओं के अनुसार राजा विराट ने माता के प्रतिमा को यहां स्थापित किया था| तब से लेकर आज तक आस-पास के क्षेत्रों में मां कौलेश्वरी श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनी हुई है |माता की प्रतिमा काले दुर्लभ पत्थर को तराश कर बनाई गई है| मंदिर के पुजारियों वह भक्तों के अनुसार माता यहां जागृत अवस्था में विराजमान हैं |मन्नत मांगने वाले भक्तों की हर मुराद माता पूरी करती है|कौलेश्वरी सिद्धपीठ के रूप में चिन्हित है। इसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में मिलता है। इसमें कहा गया है-कुलो रक्षिते कुलेश्वरी। अर्थात कूल की रक्षा करने वाली कुलेश्वरी। किवदंती है कि श्रीराम, लक्ष्मण सीता ने वनवास काल में यहां समय व्यतीत किया था। यह भी मान्यता है कि कुंती ने अपने पांचों पुत्रों के साथ अज्ञातवास का काल यहीं बिताया था। यह भी कहा जाता है किअर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह मत्स्य राज की पुत्री उत्तरा से यहीं हुआ था।

अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में अपनी पहचान बना रहा यह पर्वत हिंदू, जैन व बौद्ध धर्म का संगम माना जाता है। नवरात्र के अवसर पर पूरे इलाके के लोगों की आस्था यहां उमड़ती है। यहां हर साल चीन, बर्मा,  थाईलैंड,श्रीलंका, ताइवान आदि देशों से काफी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। भू-तल से 1575 फीट ऊंचे इस पर्वत का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है।पर्वत पर हरे-भरे मनोहारी वादियों के मध्य मां कौलेश्वरी मंदिर, शिव मंदिर, जैन मंदिर व बौध स्थल स्थित है।इनके इर्द-गिर्द स्थित तीन झीलनुमा तालाबों की नैसर्गिकता दिलकश नजारा पेश करती है।

सिद्धपीठ के रूप में चिह्नित है कौलेश्वरी – कौलेश्वरी सिद्धपीठ के रूप में चिन्हित है। इसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में मिलता है। इसमें कहा गया है-कुलो रक्षिते कुलेश्वरी। अर्थात कूल की रक्षा करने वाली कुलेश्वरी। किवदंती है कि श्रीराम, लक्ष्मण सीता ने वनवास काल में यहां समय व्यतीत किया था। यह भी मान्यता है कि कुंती ने अपने पांचों पुत्रों के साथ अज्ञातवास का काल यहीं बिताया था। यह भी कहा जाता है कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह मत्स्य राज की पुत्री उत्तरा से यहीं हुआ था।

 तमासीन जलप्रपात

यह एक काफी खुबसूरत पिकनिक स्पॉट है जो की चतरा के उत्तर – पूर्व में 26 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है | यह खुबसूरत झरना चतरा जिले के  कान्हाचट्टी प्रखंड में  है |  यहाँ पर एक बहुत बड़ा जलाशय है| इस स्थल में माँ भगवती की एक प्रसिद्ध गुफा है | यहाँ पर लोग खुबसूरत झरने को देखने के लिए दूर – दूर से आते है |तमासिन में तामासिन का टूटना है जिसका मतलब है कि अंधेरे का प्रचलन है। यह क्षेत्र मिश्रित जंगल से भरा हुआ है, जिसमें  उच्चे  पेड़ दिन के उजाले में भी अँधेरा  बनाते हैं। तमासिन एक बहुत ही खूबसूरत झरना के लिए प्रसिद्ध है जो पर्यटकों के दिये प्यार का इंतजार कर रहा है। यह क्षेत्र भारत के पर्यटन के नक्शे पर एक स्थान के योग्य है।

मालुदाह जलप्रपात

यह खुबसूरत झरना चतरा के पश्चिम में लगभग 8 किलोमीटर  की दूरी पर स्थित  है। 5 किमी तक यह गाडियों के द्वारा और 3 किमी पैदल चलकर जाना  पड़ता  है। यह  खुबसूरत झरना 50 फीट की ऊंचाई से गिरता है। इस झरने का आकर इस प्रकार है की जैसे कोई अर्ध गोलाकार पहाड़ को काटा गया  हो | यह नजारा इस जगह को और भी आकर्षक मनमोहक बनाता है |

डुमेर – सुमेर जलप्रपात

यह 12 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में स्थित चतरा का एक और महत्वपूर्ण पर्यटक  स्थल है, जिसमें 10 किमी की दुरी  वाहन द्वारा तय  किया जा सकता है और बाकी दो किलोमीटर  सड़क कच्चा होने के कारण पैदल चलना पड़ता  है। यह काफी आकर्षक पर्यटक स्थल है | यहाँ का दृश्य काफी मनोहर है | प्रत्येक वर्ष बहुत सारे पर्यटक इस स्थल में आकर बहुत हर्ष एवं आनंद उठाते है | इस तरह की ऊंचाई से पानी गिरने के लिए यह अच्छा लगता है ऐसा प्रतीत होता है कि वसंत, चट्टानी दीवारों के खिलाफ चमक रहा है, जो कि सफेद किरणों से उगते हैं। ऐसा लगता है जैसे वह सूरज के नीचे बौछार स्नान का आनंद ले रहा है |

 गोवा जलप्रपात

यह सुंदर झरना चतरा  के पश्चिम में 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जो मालुदाह जाने के  रास्ते में  है। 4.5 किलोमीटर तक, यह जीप द्वारा पहुंचा जा सकता है और बाकी 1.5 किमी पैदल चलने के लिए किया जा सकता है। यह झरना 30 फीट की ऊंचाई से जलाशय में गिरता है ।सभी तीनों तरफ चट्टानें हैं और बीच में एक जलाशय है। हर सोमवार को श्रावण (बारिश) के महीनों के दौरान लोग यहां पर एकत्र होते  हैं, झरने का आनंद लेते है और जलाशय में तैराकी का आनंद लेते हैं। यह चतरा  जिले का बहुत ही नजदीकी पिकनिक स्थल है।

कुंदा किला

पुराने कुंदा महल के खंडहर अभी भी वर्तमान कुंदा गांव से लगभग तीन-चार मील की दूरी पर पाए जाते हैं। यह जगह 17 वीं शताब्दी के अंत या 18 वीं शताब्दी की शुरुआत में बनाया गया हो सकता है। हालांकि दीवारें अभी भी बहुत ही जर्जर  स्थिति में खड़ी हैं, फिर भी बाहर की ओर से बड़ी संख्या में आगंतुकों को आकर्षित कर रहा  हैं। लेकिन दूर-दूर तक स्थित स्थानों के अशिक्षित जनता के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र, एक प्राचीन काल के अवशेषों से करीब आधा मील की दूरी पर स्थित एक गुफा है, जो महल के निर्माण के कुछ समय बाद खोदा गया था। एक संकीर्ण मार्ग महल के दक्षिणी भाग से नीचे की ओर गुजरता  है और गुफा की ओर जाता है।

यह गुफा तल से  काफी ज्यादा ऊँचा नही है | इसमे प्रवेश द्वार काफी संकीर्ण है और कोई भी व्यक्ति शरीर एवं सिर को बिना मोड़े अन्दर नही जा सकता है गुफा के अन्दर एक सेंट्रल हॉल है जो बहुत ऊँचा नही है| एक स्टैंड को सक्षम करने के लिए, अक्सर आगंतुकों द्वारा आराम करने वाले फर्श के रूप में उपयोग किया जाता है इस केंद्रीय हॉल के साथ अपने एकमात्र मार्ग के साथ जुड़े छोटे हॉल, पूरी तरह से अंधेरा हैं। गुफा के केंद्रीय कक्ष के अंदर कुछ चीजें दीवारों पर नक्काशी द्वारा लिखी गई हैं, जो बहुत अस्पष्ट नहीं हैं, हालांकि कोई इसे समझ नहीं पा रहा है

बिचकिलिया जलप्रपात

यह पश्चिम में चतरा से 11 कि.मी. की दूरी पर निरंजना (लिलाजन ) नदी के किनारे पर ‘दाह’  जलाशय है। 5 किलोमीटर तक का मार्ग मोटर द्वारा तय किया जाता है  और शेष 6 किलोमीटर पैदल चलने वाला है।

दुवारी जलप्रपात

इसे बलबल दुवारी के नाम से भी जाना जाता है | यह चतरा जिले से 35 किलोमीटर दूर पूर्व में गिधौर – कटकमसांडी मार्ग पर स्थित है |इस जगह पर हजारीबाग के रास्ते से भी पहुंचा जा सकता है | इस स्थल में चतरा एवं हजारीबाग से गाडियों द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है | इस स्थल में एक गर्म जलकुंड है जो  दुआरी गावं के बलबल नदी पर  है | गर्मकुंड का यह जल बहुत सारे त्वचा से सम्बंधित बीमारियों को दूर करता है | राजगीर की तरह ही लोग यहाँ पर अपनी रोगों से मुक्त होने के लिए दूर दूर से स्नान के लिए आते है | मकर सक्रांति के समय यहाँ पर मेला लगता है और उस समय बहुत दूर – दूर से लोग स्नान के लिए यहाँ पर एकत्र होते है |  यहाँ का दृश्य काफी सुन्दर एवं मनोहर है |

खैवा बंदारू जलप्रपात

चतरा शहर के दक्षिण-पश्चिम में जिला मुख्यालय से चतरा – चन्दवा रोड में NH-100 पर 10 किलोमीटर पर बधार और बधार से तीन किलोमीटर की दुरी पर है। जंगलों के बिच में यह दृश्यावली सभी सुंदरता के सौंदर्य में चमकदार है। बंदारू (दाह) जलाशय की धारा चट्टानों के माध्यम से अपना रास्ता बनाती है यह जलाशय पत्थर की दीवारों को काट घाटी का निर्माण कर दोनों किनारों की दीवार वाले पत्थरों में कई आकृतियों के साथ गहरी खाई बनाती  है जो की एक दुर्लभ दृश्य है। इस स्थान पर ऐसा लगता है कि पेड़ों के हिस्से को चट्टानों में स्थानांतरित कर दिया गया है। इसकी कलात्मक श्रेष्ठता में मातृ प्रकृति ने चट्टानों में चट्टानी नदी का विस्तार भयानक ढंग से कराती है। प्रतिध्वनि गाने घाटी की दीवारों से आत्मापूर्ण भव्यता के साथ एक मधुर संगीत में गूंजते हैं अगर एक पत्थर जलाशय में फेंक दिया जाता है, तो कई कबूतर उस ध्वनि से अपने घोंसले से एक साथ उड़ जाते है| धाराओं के नृत्य की लहरें, जगहों पर फोम, गड़गड़ाने की आवाज का निर्माण पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए निश्चित है क्योंकि पूरी घाटी ध्वनि के साथ गूंजती दिखाई देती है|

केरिदाह जलप्रपात

यह 8 किमी की दुरी पर चतरा के उत्तर-पश्चिम भाग पर  स्थित है| यहाँ जाने के लिए सिर्फ मोटर गाड़ी ही सक्षम  है |यहाँ पानी की गिरावट दो  पहाड़ियों के बीच  से है,जो तीन भागो में विभक्त होती है |यहाँ की चट्टानों में एक अलग ही तरह की उत्कृष्ट सुन्दरता देखने को मिलती है|